Snow-Falling-Effect

Tuesday, September 02, 2014

Sentiments of a Staff-Room Table

I am aware many of my fellow bloggers may not be able to read this post (my 200th post) still, keeping conscience over prudence,I am presenting it from the pages of our college magazine 2010,   verbatim.
 It was written as a farewell remembrance to the six exquisite gems of our college... retiring together. These were teachers ,who were synonymous with the ethos, principles and prestige of the institution. 
Incidentally,these six always sat together in the staff-room, around a hard and low table-cum-cot made of wood. Initially, the table was uncomfortable for them but gradually, mutual adaptation occurred and despite many other upgradations, somehow, the low-table remained unchanged for Forty Years ! 

With the passage of time these efficient ladies, too engrossed in their lectures and life,became comfortable to its low 'height' and its spacious vast spread. So much so that the chai-waale bhaiyya will call "Haan jee, takhat walon ki chai kahan rakhni hai?" 
The clerks will direct the helper as " jaao, ye circular takhat waalon ko de do "
They have become Takhat waale! as in Takht-e-Taus
(In case you are able to read , I sincerely hopes you like it ...)

जब भी कभी इस विद्यालय की चर्चा चलती है, तो स्मृति गह्वर  में से  अनेक स्मृतियों के मध्य एक ऐसा चित्र उभरता है जो है एक - तखत का - - एक पुराने, साधारण लकड़ी के फट्टों को जोड़ कर बनाये गए तखत का।

वस्तुतः ये इस प्रकार के दो तखत थे जिन्हे मिलाकर एक कामचलाऊ मेज़ की  रूप दे दिया गया था  कि गंभीर, गरिमामयी शिक्षिकाएँ  चहुँ  ओर से इसे घेर कर अपना कार्य कर सकें।  पर इस कामचलाऊ ने कैसा-कैसा काम चलाया ये तो विरले ही जानते हैं। 
स्वयं इस तख़्त  के शब्दों  में --

" स्टाफ़ रूम में  लौह अल्मारियों  के आने से पूर्व मैं अकेला ही हुआ करता था.शुभ प्रभात बेला से ही चिल्ल्पों  प्रारम्भ हो जाती थी।
 मैं बीसियों सुघड़ शिक्षिकाओं  के रजिस्टरों ,कापियों-किताब आदि की दैनिक पटकाई  के मधुर  शब्द  संगीत का प्रति घंटे आस्वादन करता और रजिस्टरों,डस्टरों आदि से झड़ती चॉक धूल के मनोहारी गुबार से मेरा मुखारविंद प्रातः काल ही सुशोभित हो जाया  करता। 

जब सभी शिक्षिकाएं एक-एक करके (द्वार छोटा होने के कारण ) अपनी-अपनी कक्षाओं में चली जाती तब विशाल जंगले में से छन-छन आती सुनहली धूप की किरणे  मुझ पर बिछी चॉक  धूल के कणो से भांति -भांति का खिलवाड़ कर भौतिकी विभाग के प्रकाश अपसारण  आदि नियमों का पालन करते हुए मन-मोहक माया चित्र बनाती। 

इसी  बीच यदि कोई मॉनिटर छात्रा किसी  अतिव्यस्त शिक्षिका का भूला हुआ रजिस्टर बड़ी निर्ममता से घसीट  लेती, तो मेरा सौंदर्य बिखर जाता और किसी अन्य शिक्षिका की डीप फ्रीज करी वॉटर बॉटल के ऊपर से गिरते शीत वाष्प जल बिंदुओं  घुलकर ऐसा बहता कि महादेवी की पीड़ा प्रसाद के आँसू बन साकार हो उठती। 

 फिर,कुछ देर बाद प्रारम्भ हो जाता सु-स्वादु लज़्ज़तदार व्यंजनों से ठसे स्टील के नाश्तेदानों के खुलने  सिलसिला और मैं उस लज़ीज़ खाने की सुगंध में आकंठ डूब जाता और यदि कभी कुछ बिखर गया, तो पायों तक!

प्याज के परांठे , हरी मिर्च की कतरने, सिरके में ओत -प्रोत मूली के चंदे……… 

टिफिनो,बोतलों,रजिस्टरों के बोझ के अलावा मैं इनके नाना प्रकार के  चौरस ,आयत,तितलीनुमा,सुन्दर या कम-सुन्दर सभी तरह के बैगों को भी वहन करता और मेरी भलमनसाहत तो देखिये, कि 5 घंटे के लिए ये मुझ पर अपना पूरा घर-संसार बसा लेती और मैं मूक प्रसन्नता व्यक्त करता हुआ सब वहां-सहन करता।
उफ़! तक नहीं करता। 

कभी अपनी  किताबें ,बैग,बोतलें,डिब्बे,एक-दूजे के लिए  लायी गयी भेंट ,उपहार ,लड्डू,पान,सुपारी,मेवा,मिठाई आदि मुझ पर चढ़ाती,तो कभी शॉर्टकट मार कर खुद चढ़  जातीं और तो और अपने नौनिहालों को भी चढ़ा देतीं। इतना ही नहीं, इनके नन्हे शिशुओं को खुद पर सुलाना,बॉटल से दूध पीते  शिशु के पैरों की मधुर थाप खुद पर पड़ते हुए सुनना, उनके नन्हे पैरों की साइकल  से  पिटना आदि ऐसे अनेक   सद्कार्य हैं जो A.K.P.Inter College के स्टाफ रूम का तख़्त बन कर मैंने सम्पन्न कराएं हैं।  


 इस सबका एक सुनहरा पक्ष यह भी है  कि इनके साथ प्रतिदिन के ५ घंटे बिता मैं जड़-जंगम भी कूपमंडूक न रह सका। मैं गणमान्य अथितियों के वक्तव्यों,अपनी शिक्षिकाओं के ओजस्वी  भाषणों , मर्म-स्पर्शी कवितायों व् विचारशील गोष्ठियों का श्रोता बना हूँ। 

यदि पायों से जड़ें निकल सकती तो मैं दिखलाता कि इनके संसर्ग में मैं कितना कुसुमित व् पल्लवित हुआ हूँ। 

रोचक,रोमांचक,मार्मिक,अर्थपूर्ण,हास्यपूर्ण संसार में घटने वाली समस्त घटनाक्रमों का ज्ञान देने वाली ये शिक्षिकाएं मेरा BBC Channel हैं। 

साहित्यिक,दार्शनिक,वैज्ञानिक व् सांस्कृतिक , जीवन का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिसकी सुगठित , सुन्दर व् स्वस्थ चर्चा को मैंने सुना  ना हो।
 व्यक्तिगत जीवन की कठिनायों से लेकर कार्यक्षेत्र की चुनौतियों का डटकर मुक़ाबला करने की  कला  को भी मैंने इनसे उसी तरह आत्मसात  कर लिया है जैसे की मैं भूलवश  गिरी  अचार की फाँक के तीखे स्वाद को कर लेता हूँ।
उनका तीखापन मुझे अभी तक याद है.……… 

 तीखेपन की तो वैसे भी शिक्षिकाओं में कमी नहीं होती और मेरे चारों ऒर वाली तो, जैसे हरपल मोर्चाबद्ध रहती थीं। 
घर हो या विद्यालय, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासित, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ व् तत्पर।  
अतः मुझे प्रसन्नता  है कि ऐसी संगिनियों के साथ मैंने जीवन के इतने  वर्ष  व्यतीत किये।  

ऐसी संगिनियाँ ,जिन्होंने मुझे ऊन के गोलों और बुनाई के नमूनों से दूर रखा,जब भी इनकी बातें  सुनी ,आगे बढ़ने ,कठिनाइयों से जूझने  व् सत्य  पर टिके रहने की ही  प्रेरणा मिली। संभवतः इसीलिए आज तक  यहाँ पर टिका हुआ हूँ, कि जब भी मन की कोई कील उखड़ी , चट से इनमे से किसी चतुरा ने अंदर ठोंक दी। 

उसी तत्परता व् स्नेह से जिससे ये अपने जीवन की  इधर-उधर निकली कीलों को ठोकती आयीं हैं। कठिन परिस्थितियां, कठिन बच्चे, उनसे भी ज़्यादा कठिन नाती,पोते, धेवते, नातेदारों ........... सभी को प्यार से,फटकार से आवश्यकतानुसार ठोकतीं आयीं हैं. 

ये साधारण दिखने वालीं मेरी शिक्षिकाएं अत्यंत साहसवाली, ओजपूर्ण, कर्मठ महिलाएं हैं। 
 ईर्ष्याखोरों द्वारा  दी गयी प्रत्येक कठिनता को सरल बना लेने व ईश्वर-प्रदत्त  दुरूहता को भी सहज स्वीकार करने  क्षमता रखने वाली मेरी ये कार्यक्षेत्र की साथिनें निश्चय ही असाधारण हैं. 

अब, जब मेरे पास इनकी पुरानी साड़ियों की गमक़ नहीं होगी अपितु  नयी साड़ियों की सरसराहट होगी, तो मैं, जो इनके जुमलों व सुलझे हुए निर्णयों का मूक-दर्शक, श्रोता एवं सहभागी भी हूँ, यह आशा करूंगा कि आने वाली साथिनों के लिए मैं मात्र एक लकड़ी का तख़्त यो मेज़ ना रह कर सिंघासन-बत्तीसी बन पाऊँ। तभी मेरा-इनका साहचर्य सफल होगा। 
कुछ ऐसे ही हैं मेरी ये विलक्षण संगिनियां। 

"चिर मोद  का अवसर रहे 
मानस से बनूँ विनीत 
सर्वत्र में विचरे रमा 
ज्ञान कुसुमों का हो आशीष  
शशि आभा सा दीपित होऊं  
कर्तव्य के गाऊँ गीत 
मानस-चित्रों को निखराऊँ  
प्रतिबिंबित हो निज प्रीत 
                       यही मेरी आशा है 
                       यही अभिलाषा है।
                                              With love n reverence-
                                                      From the Takht of Staff-room....

40 comments:

  1. :-( couldn't read it...takes a l-o-n-g time for me to read hindi..
    But memories of school and college days are so sweet that they are sure to make us smile...always.....my regards to those teachers.... :-)

    ReplyDelete
    Replies
    1. Yeah.. I understand Mani, and its one l-o-n-g post as well :) thanks for your sentiments for those teachers ... They were awesome :)

      Delete
  2. Hee hee :D takat walon ki chai!!! :D :D :D .. I'm sorry, my Hindi is very limited, but I did like that one phrase a lot :).. And the unsung heroes of college :) :)

    ReplyDelete
    Replies
    1. Yeah vinay I guessed that it is going to be hard to read it ... its been there from ages as a draft for this reason alone... still you managed the main phrase.. after all its all about the takhat and the takht wale : ) Thanks for the effort friend :)

      Delete
  3. Wow..loved the whole piece. Writing in hindi is also an art, we hardly use such strong words nowadays but now I sort of miss it :)

    My grandfather was a hidni teacher, he used to make me write a hindi essay every day. He used to say 'everybody will start focusing so much on english that you'll forget your hindi'.. and now I realize how accurate he was

    ReplyDelete
    Replies
    1. Its good you liked it Ritika.... And even great to know that your grandfather taught Hindi... Yes, Old is always Gold ... as we both can see... he was so right.. Thanks for being here :)

      Delete
  4. Jab bhi man ki koi keel ukhdi, in main kisi ne phir se thok di...I can so relate to your post Kokila. Lovely.

    ReplyDelete
    Replies
    1. Hey you girl.. Big welcome... :) now tell me you ,who weaves much anguish in so few words how come you like it ...Its too long and in Hindi !! Lol :D
      thanks for surviving the post dear :)
      But yes, Shweta that takht was no less then Singhasan Battisi !

      Delete
  5. Great tribute to them.
    Congrats on your 200th.

    ReplyDelete
  6. Kokila mai ne than Iiya tha ki mai poora pad kar rahoongi. Padne ke badh patta chala ki mai hindi kitana bhool gaiyee hoon. Is post ne mujhe yaad dilaya wo purani filmain jin main dialogue isi prakar ki bhasha main hua karti thi.
    Thanks for this wonderful post

    ReplyDelete
    Replies
    1. So many thanks Shashi for your patience and persistence!
      It really is something to read the full post which is LONG even by my standards .AND THEN to WRITE in Hindi... Amazing feat! You have not done a single grammatical error :) In fact I toyed with the idea of translating it but then I wanted the local flavour to remain in it....
      You surely have qualities similar to your namesake Shashi (Sridevi) in Hindi Movie English-Vinglish .... her character must have been a dimension of your multifaceted creative personality :)
      Tons of thanks for being so patient and sensitive :)

      Delete
  7. I am jealous of your HINDI skills...I suck at it..especially since I am a Malayalee...though born and bought up in the north. :D

    ReplyDelete
    Replies
    1. Dear RH, At least you do 'something' even if its sucking, at Hindi ... I can not even boast of that when I don't know up from down in Malyalee :( and for that matter in Tamil/Telegu.... just 5% Kannada and 2% Bengali :D .. waise bhi you are to be proud of yourself as you visited here trying to grasp what sometimes even Hindi speakers don't get .. Heart felt thanks for your gesture RH :)
      PS. where in north you used to live ?

      Delete
  8. Hey Kokila! I simply loved every single word of this juicy piece! Brilliant Hindi ma'am!! (even the transliteration is flawless:)) Hats off!!
    You have immortalized that poor inanimate 'takht' :)

    ReplyDelete
    Replies
    1. I am humbled by your words Amit ... its gives immense satisfaction that someone has grasped the nuances of the language.
      I never thought you of all, will have the patience to read it ... so praise coming from you is elixir :)
      A useless detail- the child who used to beat the takhat with her feet while feeding was me :) hence, I was so attached to it that I wrote it from his perspective ... Thanks Again.

      Delete
  9. I tried to read but oops No, i dint understand even one word.. must be a beautiful tribute to the teachers.
    And btw, congrats on your 200th post.. :)

    ReplyDelete
    Replies
    1. No issues dear I knew its going to be gibberish to most but I wanted to post so.... :) and Thanks a lot dear for your wishes :)

      Delete
  10. Congrats for your 200th Post, Kokila!
    Bas yaasdein rah jaati hain. We can never forget our teachers.

    ReplyDelete
    Replies
    1. Thanks Anita and what apt lines :) So true .....

      Delete
  11. You're right I found it difficult to understand most of it.

    ReplyDelete
    Replies
    1. Its okay Sir ... Thanks for being here :)

      Delete
  12. Dear Kokila, I can’t read the words, but I can feel the love, and I really like the title. I tried to learn shorthand once, I was hopeless at it but some of the lines and strokes in your text reminded me of that.

    ReplyDelete
    Replies
    1. Oh ! Barbara ... Its gladdening enough that you wanted to :)
      I posted it as I said "heart over prudence " :) And yes letters from different languages look strange .. thanks for your visit :)

      Delete
    2. Oh! Barbara, It must be late at your side of world !

      Delete
  13. Couldn't have been a better day to read this post - what a warm lovely tribute by the takhat and written in such beautiful diction, brilliant job - loved reading every bit of it.

    ReplyDelete
    Replies
    1. Thanks to you Arti to read such a long one! And its me who is pleased as you seem to loved it... Yes , with Teacher's Day around the corner it is an ode ... SO glad you liked it :)

      Delete
  14. I want to read, I know I can read Hindi...but have been out of touch for so many years...still have book marked it for a later read. But I did enjoy all the comments.

    ReplyDelete
    Replies
    1. Lolz.... Thanks a lot Vidya for the honesty and I loved the bit about reading the comments... :) I would have done the same in similar situation...wishing you luck with Hindi :P ... and lotz of love :)

      Delete
  15. Ur lucy .. u get the time to read so many books ..
    Nice review .. keep reading

    ReplyDelete
    Replies
    1. Hey Ankur !! I am NOT lucy though I'd love to wear Scarlet's shoes for a change :P And it is NOT a review dear friend !
      But thanks for your best intentions ... Lolz :)

      Delete
  16. I finally read it...ashamed and realized how much I struggled to read and understand some of the words...but I enjoyed some of the lines - especially the BBC Channel one...What a tale of table! Wish I had better vocabulary power to enjoy all the expressions....

    ReplyDelete
    Replies
    1. Its commendable of you to actually read it! Heart felt thanks Vidya :) Am really glad you enjoyed it ...even if in bits n pieces :P
      PS: Coming from the dumb n mute takhat, an expression which is dear to me is -
      "If roots could spurt from my wooden legs;I would have shown what flourish,bloom and burgeoning I had gained in their companionship"
      with Tons of love for your kind words Vidya :)
      The same takht .. err... Kokila

      Delete
    2. ha ha ...see now with these notes above it's giving me a better understanding :)

      Delete
  17. Nice one Kokila. Quite creative.

    Congrats on 200 posts.

    ReplyDelete

Your views and thoughts make this blog work ...Thanks a lot. :)

You May Also Like

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...