ग़ज़ल : फ़िकर

जब कभी चाँद को दहलीज़ पे लाना होगा
धूप ढ़ल जाएगी, उजालों को जाना होगा।

लफ्ज़ सस्ते थे, चमकदार थे, सो, खूब चले
फिर कोई दानिश लन-तरानी का निशाना होगा

जरा सी बात है कि हम नहीं रहे हमदम
जाम पकड़ोगे तो शर्मिंदा मयखाना होगा।

दुआ है नये सब दोस्त ज़ैब-ओ-अक्लमन्द मिलें
वरना दिल फिर कोई हाथों से दबाना होगा।

क्या फ़िकर है, यही, डरते हो लौट आएंगे?
बाद मरने के भी अब हिज़्र निभाना होगा।


दहलीज़- threshold
दानिश- wise                                           लन-तरानी- rhetorics, words of mockery (or) false praise
 हमदम- soulmate                                 मयखाना - winehouse
ज़ैब-ओ-अक्लमन्द - embellished and intelligentहिज़्र - absence, separation from beloved.           निभाना- Observe

10 comments:

  1. बहुत खूब कोकिला जी । बेहतरीन शायरी की है आपने ।

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  2. ध्यान देना नये सब दोस्त ज़ैब-ओ-अक्लमन्द मिलें
    वरना दिल फिर कोई हाथों से दबाना होगा।
    वाह !! बहुत खूब कोकिला जी

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    1. बहुत बहुत आभार! Your comment always inspire me to write better! :)

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  3. जरा सी बात है कि हम नहीं रहे हमदम
    जाम पकड़ोगे तो शर्मिंदा मयखाना होगा।
    Loved this line!

    Shaandar..jabardast!

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  4. वाह ! खूबसूरत ग़ज़ल ! बहुत खूब आदरणीया ।

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  5. Reading a ghazal after many many days. Loved the way you have used such beautiful verses to convey the acceptance of separation - बाद मरने के भी अब हिज़्र निभाना होगा।

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    1. Nailed it! Yes, don't want to but have to accept that separation is inevitable and, forever.
      You've got the essence, Somali! :) Thank-YOU, for stopping by, girl!

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